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सद्दाम हुसैन (रियल हीरो) के बारे में रोचक तथ्य।

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Saddam Hossain  28- April-1937 तिकरित में पैदा हुए थे ये वही शहर था जहां कभी शलाहुददीन अय्यूबी जैसा शेर पैदा हुआ था। सद्दाम हुसैन के पैदा होने से पहले ही उनके पिता का देहांत हो गया था। उन्होंने जामीय अल काहीरा यूनिवर्सिटी में अपनी पढ़ाई पूरी की। सद्दाम हुसैन इराक के सबसे दानी ईनशान थे जिन्होंने एक अमेरिकी चरश को करोड़ों की संपत्ति दान करदी । जिससे ईसाई धर्म के लोग बहुत पृभावित हुए। सद्दाम हुसैन को मििडिया एक तानाशाह बताती । लैैैकिन सद्दाम हुसैन एक ईमानदार,दयालु, ईनशान थे। लेकि यह जानकर आश्चर्य होगा कि सद्दाम हुसैन इराक के सबसे ताकतवर हुकुमरान थे। उन्होंने अपने 30 liter ख़ून से क़ुरान शरीफ़ लिखवाया था।जो आज भी ईराक में मोजूद है। सद्दाम हुसैन ने बड़े पैमाने पर हस्पताल,मस्जिद,मदरसों का निर्माण करवाया था। उनके शासन काल में ईराक सबसे बड़ा अर्थव्यवस्था देश बनगया था । उनके शासन काल में ईराक के लोग सबसे बेहतर जीवन जी रहे थे। 1980 में United States ने सद्दाम हुसैन को Unisco अवार्ड से सम्मानित किया था। सद्दाम हुसैन के द्वारा बनाई गई मस्जिदों की सुरंगों का आकार मिशाइलो की तरह ह...

अशफाकउल्ला खान (22 अक्टूबर 1900 - 19 दिसंबर 1927) भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में एक भारतीय स्वतंत्रता कार्यकर्ता और हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन के सह-संस्थापक थे।

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अशफाकउल्ला खान (22 अक्टूबर 1900 - 19 दिसंबर 1927) भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में एक भारतीय स्वतंत्रता कार्यकर्ता और हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन के सह-संस्थापक थे। खान का जन्म शाहजहांपुर, भारत में शफीकुल्लाह खान और मजहरुनिसा के घर हुआ था। उनका जन्म खैबर जनजाति के एक मुस्लिम पठान परिवार में हुआ था। वह अपने पांच भाई-बहनों में सबसे छोटे थे।  1920 में, महात्मा गांधी ने भारत में ब्रिटिश शासन के खिलाफ अपना असहयोग आंदोलन शुरू किया। लेकिन 1922 में चौरी चौरा की घटना के बाद, महात्मा गांधी ने इस आंदोलन के आह्वान को वापस लेने का फैसला किया।  काकोरी डकैती का मामला।  उस समय, खान सहित कई युवा उदास महसूस कर रहे थे। तभी खान ने समान विचारधारा वाले स्वतंत्रता सेनानियों के साथ एक संगठन बनाने का फैसला किया, जिसके परिणामस्वरूप 1924 में हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन का गठन हुआ। इस एसोसिएशन का उद्देश्य एक स्वतंत्र भारत प्राप्त करने के लिए सशस्त्र क्रांतियों का आयोजन करना था। अपने आंदोलन को बढ़ावा देने और अपनी गतिविधियों को अंजाम देने के लिए हथियार और गोला-बारूद खरीदने के लिए, हिंदुस्त...

जंग ए आजादी के इतिहास में मुसलमानों की कुर्बानी

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M J Khan     कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी         सदियों रहा है दुश्मन दौरे जहां हमारा                                      अशफाक उल्ला खां                           जंग ए आजादी (1833,1857,1947) में मुसलमानों की भुमिका। जंग ए आजादी में मुसलमानों ने जो कुरबानी दी थी उनको इतिहास ने भुला दिया मगर हमने भी भुला दिया है भारतीय राष्ट्र राज्य के निर्माण में हिंदुओं के साथ मुसलमानों का भी योगदान रहा है। मुगलों के आने के बाद भारतीय राष्ट्र का वह स्वरूप नहीं रहा जो प्राचीन काल में था। मुल्क की संस्कृति एवं सभ्यता के स्वरूप में भी बदलाव आए और एक साझी संस्कृति का निर्माण हुआ। जंगे-आजादी में केवल हिंदुओं ने ही नहीं बल्कि मुसलमानों ने भी अपनी कुर्बानियां दीं। लेकिन आज कुछ दक्षिण पंथी ताकतें विशेषकर टीवी चैनल मुसलमानों को गद्दार और देशद्रोही सिद्ध करने पर तुले हैं। शायद लोगों ने आजादी के इतिहास को ठीक स...