यह्या अल-मशद नामी अटॉमिक वैज्ञानिक ।जिनको मौसाद ने जान बुझकर निशाना बनाकर कत्ल कर दिया
यह्या अल-मशद नामी अटॉमिक वैज्ञानिक को फ्रांस के अंदर क़त्ल कर दिया गया. इसी तरह ईरान के बहुत से वैज्ञानिक जिन का तालुक खासतौर पर डिफेंस टेक्नोलॉजी से था. इन्हें मौसाद ने जान बुझकर निशाना बनाकर कत्ल कर दिया और आज मुस्लिम कौम के बारे में ये धारणा है के ये कोई जाहील और फसाद फैलाने वाली कौम है. जिस ने वैज्ञान के मैदान में कुछ भी नहीं किया यानी के जदीद दौर के कोई भी अविष्कार मुस्लमानो ने नहीं किए. जिन का रोना आज हमारे मुल्क के दानिश्वरो के ज़बानी आप को सुनने को मिलता रहता होगा. मगर ऐसा नहीं है बस हमें बताया नहीं जाता.
आप ने इन अज़ीम वैज्ञानिकों के कारनामों और इनके पुर असरार मौत का जिक्र मिडिया या किसी दानिश्वर की ज़ुबानी सुना.....
और शायद हम जानना भी नहीं चाहते बस जो कुछ किसी ने बताया तो हम ने मान लिया. खुद कभी हम ने रिसर्च कि ही नहीं.
याद रहे जब भी किसी कौम पर ज़वाल आता है. तो सबसे पहले उनके अंदर जाहिलो की तादाद में इज़ाफ़ा हो जाता है. वो इल्म की मुखालिफ होकर कारोबारी बन जाते हैं. इनके इल्म की मक़्सद ज़ाती मफाद का तहफज़ होता है ना के अख्लाकी और समाज़ी जिंदगी के अंदर सुधार लाना.
अगर किसी को लंदन के म्युजियम में जाने का इतेफाक हो तो वहां पर इस्लाम के आगाज़ से लेकर पिछली सदी तक की हर तरह की किताबें, टुल्ज और मुस्लमानो के तय्यार करदा नक्शे देखने को मिलेंगे. मगर वहां कौन जाए और उन पर रिसर्च करे. पुरी युरोप की लाइब्रेरियां मुस्लमानो की किताबों से भरी पड़ी है और बर्तानीया के अंदर पिछली सदी तक के नुस्खे मौजूद हैं.
बहुत मज़े के साथ ये बात कही जाती है के हिंदुस्तान मे
मुगल दौर के अंदर जब मुस्लमान सिर्फ इमारतें बना रहे थे उस वक्त मग़रिब के अंदर आक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी बन रही थी. लेकिन किया कभी उन लोगों ने बताया के ये इमारतें और बड़े बड़े महल बिना किसी इंजीनियर के बन सकते हैं? केमिस्ट्री के इल्म के बगैर शिशा, सिमेंट और रंग वगैराह बनाई जा सकते है जो उन इमारतों में इस्तेमाल की जाती थी? किया हिसाब किताब और mathamatics के बगैर एक बड़े मुल्क का निज़ाम चलाया जा सकता है? किया वहां पर सड़कें बनाई जा सकती है? फसलों और बागों का निज़ाम, आबपाशी, पुल और सुरंगें वगैराह बगैर किसी इल्म और तजरुबे के बनाई जा सकती है??
लेकिन हमें तो सब मालुम है के ये तो सारे मुस्लमानो की ही दौर में हुई थे और कोन सी किताब के अंदर लिख आहै के मुस्लमानो को ये इल्म मगरीब वाले आकर सिखाते थे.
बहुत मज़े से ये बात भी कही जाती है के जब इंग्लैंड के अंदर जिंदगी बचाने वाली दवाओं को तय्यार किया जा रहा था तो उस वक्त हिंदुस्तान के अंदर औरतें ज़चगी के दौरान मर रही थी. यानी के हिंदुस्तान के अंदर निज़ामे सिहत सिरे से मौजूद ही नहीं था. काश उन लोगों ने थोड़ी सी तहक़ीक़ कर ली होती तो पता चलता के देहली के सुल्तानो के जमाने में एक बहुत बड़ा हेल्थ का इन्फ्रास्ट्रक्चर मौजूद था. हकीमों की तरबियत के इदारे भी थे. हर इलाके में हुकूमत के जेरे निगरानी तबीब हुआ करते थे.
लेकिन हमारे ज़हनो के अंदर ये डाल दिया गया है के हम कुछ भी नहीं थे और न अब कुछ है. मगर कुरान हमें बार बार गौर व फिक्र की दावत दे रहा है. मगर हम कुरान की कहां मानने वाले हैं. इस को तो हम ने पढ़ने के बजाए अलमारियों में रखा है. इसे तो हम इस वक्त निकालते हैं . जब इस की क़सम खानी हो या बेटीयों को रुखसत करना हो.
आज हमारी नज़र में सिर्फ मग़रिबी ही सब कुछ है और ये सोच हमारी नस्ल के अंदर ज़हर की तरह भरी जा रही है और जो लोग इस सोच को मुस्लिम मुआशरे के अंदर पैदा कर रहे हैं, खुदारा इन को पहचानने की कौशिश करें....
इसी बात पर अल्लामा मुहम्मद इक़बाल ने कहा था
अपनी उम्मत पर क़्यास अक़वाम मगरीब से न कर,
खास है तरकीब में कौमे रसुले हाश्मी
याह्या एल मशद मिस्र के एक परमाणु वैज्ञानिक थे जिन्होंने इराकी परमाणु कार्यक्रम का नेतृत्व किया था। वह जून 1980 में पेरिस के एक होटल के कमरे में मारा गया था, एक ऑपरेशन में आमतौर पर मोसाद को जिम्मेदार ठहराया जाता था।
एल मशद का जन्म 1932 में मिस्र के बेन्हा में हुआ था।उन्होंने तांता में शिक्षा प्राप्त की और 1952 में अलेक्जेंड्रिया विश्वविद्यालय में इंजीनियरिंग संकाय में इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग विभाग से स्नातक की उपाधि प्राप्त की। हालाँकि उन्होंने 1956 में डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त करने के लिए लंदन की यात्रा की, स्वेज संकट के कारण उन्होंने अंततः अपनी पढ़ाई पूरी करने के लिए मास्को की यात्रा की। उन्होंने अलेक्जेंड्रिया विश्वविद्यालय में परमाणु इंजीनियरिंग में प्रोफेसर की उपाधि स्वीकार करने के लिए 1964 में मिस्र लौटने से पहले सोवियत संघ में लगभग छह साल बिताए।
एल मशद मिस्र के परमाणु ऊर्जा प्राधिकरण में शामिल हो गए और 1967 में छह-दिवसीय युद्ध के बाद मिस्र के परमाणु कार्यक्रम को रोक दिए जाने तक एक परमाणु इंजीनियर के रूप में काम किया। इसके बाद उन्होंने इराक की यात्रा की,जहां उन्होंने इराकी परमाणु कार्यक्रम का नेतृत्व किया,और फ्रांस के साथ इराक के परमाणु सहयोग समझौते की निगरानी की। 1980 में उन्होंने यूरेनियम शिपमेंट प्राप्त करने से इनकार कर दिया क्योंकि यह सहमत विनिर्देशों को पूरा नहीं करता था, जिसके बाद फ्रांसीसी ने शिपमेंट प्राप्त करने के लिए पेरिस में उनकी उपस्थिति पर जोर दिया।
14 जून 1980 को, एल मशद पेरिस के ली मेरिडियन होटल में अपने कमरे में मृत पाए गए। कुछ सूत्रों का कहना है कि उनका गला कटा हुआ और चाकू से वार करने के कई घाव पाए गए थे, अन्य कि उन्हें मौत के घाट उतार दिया गया था। हफ्तों बाद, पेरिस की एक वेश्या, जिसका मशद की मौत से संबंध होने का आरोप था, खुद एक हिट एंड रन ऑटोमोबाइल द्वारा मारा गया था। फ्रांसीसी अधिकारियों को इजरायल की खुफिया एजेंसी मोसाद पर संदेह था, लेकिन उनके पास कोई सबूत नहीं था। एल मशद की मृत्यु के तुरंत बाद इज़राइल ने बयान जारी किया, जिसमें दावा किया गया कि इराकी परमाणु कार्यक्रम मंद हो गया था, लेकिन इसमें शामिल होने से इनकार किया।
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