शकीला शेख - कागज के टुकड़ों, अखबार के पन्नों और कार्ड बोर्ड से खेलने वाली एक लड़की अपने हुनर से कैसे जर्मनी, फ्रांस, नॉर्वे और अमेरिका तक पहुंच गई।

   कब खाया जाए। कब पढ़ा जाए ओर कब कमाया जाए ।                     ये वक्त नहीं हालात तय करते हैं 



जीवन किया है।

एक संघर्ष (जिस में सफलता हो) ही जीवन है 

सफलता व कामयाबी की चाहत तो सभी करते हैं, लेकिन उस सफलता को पाने के लिए किए जाने वाले संघर्षों से कतराते हैं  मिलने वाली सफलता सबको आकर्षित भी करती है, लेकिन उस सफलता की प्राप्ति के लिए किए जाने वाले संघर्ष को कोई नहीं देखता, न ही उसकी और आकर्षित होता है, जबकि सफलता तक पहुँचने की वास्तविक कड़ी वह संघर्ष ही है । हम जिन व्यक्तियों को सफलता की ऊँचाइयों पर देखते हैं, उनका भूतकाल अगर हम देखेंगे तो हमें जानने को मिलेगा की यह सफलता जीवन के साथ बहुत संघर्ष से प्राप्त हुई है ।

हमने काफी सुना होगा कि एक सफल व्यक्ति का पिछली जिंदगी में एक संघर्ष है 



सफलता व कामयाबी की चाहत तो सभी करते हैं, लेकिन उस सफलता को पाने के लिए किए जाने वाले संघर्षों से कतराते हैं । मिलने वाली सफलता सबको आकर्षित भी करती है, लेकिन उस सफलता की प्राप्ति के लिए किए जाने वाले संघर्ष को कोई नहीं देखता, न ही उसकी और आकर्षित होता है, जबकि सफलता तक पहुँचने की वास्तविक कड़ी वह संघर्ष ही है । हम जिन व्यक्तियों को सफलता की ऊँचाइयों पर देखते हैं, उनका भूतकाल अगर हम देखेंगे तो हमें जानने को मिलेगा की यह सफलता जीवन के साथ बहुत संघर्ष से प्राप्त हुई है ।


कहानी का स्त्रोत 👉


शकीला शेख उस महिला का नाम है जिसने शिक्षा और हुनर से अपना नाम रोशन किया. गरीबी से परेशान शकीला की मां ने उसकी शादी 12 साल की उम्र में करा दी, लेकिन शकीला ने हार नहीं मानी और नतीजा आज दुनिया के सामने है.




शकीला शेख कागज के टुकड़ों, अखबार के पन्नों और कार्ड बोर्ड से खेलना जानती हैं. बिना कैंची के वे कागजों को आकार, रूप और रंग देती है. अगर उन्हें सही मार्ग दर्शन नहीं मिलता तो शकीला शेख का बचपन कोलकाता की सड़कों पर गुमनामी में ही बीत जाता. शकीला ने अपने अंदर कैद कलाकार को आजाद किया है और अपनी कला को जर्मनी, फ्रांस, नॉर्वे और अमेरिका तक पहुंचाया.


कभी सब्जी मंडी में बचपन बिताने वाली शकीला शेख आज अंतरराष्ट्रीय मंच पर जानी मानी कोलाज आर्टिस्ट हैं. शकीला ने अपनी आर्थिक स्थिति को कभी अपने सपनों के बीच आने नहीं दिया. पश्चिम बंगाल के दक्षिण 24 परगना जिले के नूरग्राम गांव में रहने वाली शकीला कहती हैं, "जब मैं बहुत छोटी थी, तब मेरे अब्बा हमें छोड़कर चले गए. छह भाई-बहनों में मैं सबसे छोटी हूं. घर की पूरी जिम्मेदारी मेरी मां पर आ गई. मां घर से 40 किलोमीटर दूर कोलकाता के तालतला मार्केट सब्जी बेचने जाया करती थी. मैं भी मां के साथ जाती लेकिन मैं सब्जी नहीं बेचती थी. मैं सड़क पर चलने वाले लोगों, गाड़ियों, बस और ट्राम को देखती.”



शकीला का बचपन ऐसे ही आभावों और मुश्किल हालात में गुजर रहा था लेकिन एक दिन उनकी जिंदगी में एक ऐसे शख्स की आमद हुई जिससे शकीला का जीवन पूरी तरह बदल गया. जिस सड़क पर शकीला की मां सब्जी बेचा करती थी वहीं रोजाना एक शख्स सब्जी लेने आता था, वह शख्स बच्चों को पेंसिल, किताब आदि चीजें मुफ्त में बांटता. इस शख्स का नाम बलदेव राज पनेसर था, असल में बालदेव राज पनेसर सेवानिवृत्त सरकारी कर्मचारी के साथ-साथ एक कलाकार भी थे. बलदेव ने शकीला की मां को शकीला को स्कूल में पढ़ने भेजने के लिए तैयार किया. बलदेव ने शकीला का तालतला के ही स्कूल में दाखिला कराया. हालांकि शकीला ज्यादा सालों तक स्कूल नहीं जा पाई और उसकी कम्र उम्र में ही शादी हो गई. अपने जीवन के बारे में शकीला आगे बताती हैं, "मैंने गरीबी को कभी अपनी मजबूरी नहीं बनाई. पनेसर बाबा ने जो मुझे शिक्षा दिलाई उसी को मैंने हथियार बनाया. बाबा ने ही मुझे कलाकार बनने के लिए प्रेरित किया. मेरे परिवार ने जो बुरे दिन देखे हैं वो दिन खुदा किसी को ना दिखाए.”


"सिख पिता, मुस्लिम बेटी”


12 साल की उम्र में शादी ने जैसे शकीला की उम्मीदों के पंख को जकड़ लिया. शादी के बाद शकीला का पति भी सब्जी बेचता था. हालांकि शकीला को पति की कमाई से घर चलाने में बहुत कठिनाई होती, उन्होंने बलदेव राज पनेसर से इस बारे में बात की, पनेसर ने उन्हें कागज के थैले बनाकर बेचने की सलाह दी. कागज के थैले बनाते-बनाते शकीला ने अपना पहला कोलाज बनाया और अपने पिता समान बाबा को उसे दिखाया. शकीला के कोलाज से बलदेव राज प्रभावित हुए और उन्हें कोलाज बनाने के लिए प्रेरित किया. शकीला के पति अकबर बताते हैं, "बलदेव बाबा ने शकीला की आंखों में एक कलाकार को देखा. शकीला ने पेंट-ब्रश की जगह कागज के टुकड़े, अखबार और कार्ड बोर्ड को रचानत्मक रूप दिया.”


कलाकार बनने का संघर्ष


शकीला कहती हैं कि उन सालों हमें बलदेव बाबा ने कभी एहसास नहीं होने दिया कि वे सिख हैं और हम मुसलमान. शकीला के मुताबिक, "असल में बाबा तो इंसानियत में यकीन करते थे. मैंने उन्हें बहुत कम उम्र में देखा और जब भी देखा एक दयालु इंसान के रूप में देखा. बाबा ने भी मुझे जाति और धर्म के चक्कर में ना पड़ने की सलाह दी. उन्हीं की सलाह की वजह से मैंने काली, दुर्गा और अन्य भगवानों का कोलाज बनाया जिसे लोगों ने खूब सराहा.”


1990 में शकीला शेख ने अपनी पहली प्रदर्शनी लगाई और उनकी कला की तारीफ भी हुई और उसकी अच्छी कीमत भी लगी. वक्त के साथ शकीला के कोलाज आर्ट जर्मनी, फ्रांस, नॉर्वे से लेकर अमेरिका तक पहुंच गए. बलदेव राज पनेसर ने शकीला को आगे बढ़ने के लिए कोलकाता के ही सेंटर ऑफ इंटरनेशनल मॉर्डन आर्ट से रूबरू कराया. आर्ट गैलरी के जरिए शकीला अपने कोलाज आर्ट दुनिया भर में बेच रही हैं.



शिक्षा और मेहनत से मिली कामयाबी


शकीला कहती हैं, "कलकत्ता की सड़कों पर मैं भूखे पेट सोई, भीषण गरीबी देखी लेकिन मेंने कभी बड़ा बनने का सपना नहीं छोड़ा. जिंदगी में हालात कैसे भी आए हमें खुद पर भरोसा रखना चाहिए और सकारात्मक सोच के साथ आगे बढ़ना चाहिए.”


शकीला शेख और उनके पति अब 24 परगना के बराइपुर के नूरग्राम में रहते हैं और वहीं अपना स्टूडियो चलाते हैं. शकीला कहती हैं जो भी बच्चे मुझसे कोलाज आर्ट सीखने आते हैं, मैं उन्हें हमेशा ईमानदारी और मेहनत से जी ना चुराने की सलाह देती हूं साथ ही इस बात पर भी जोर देती हूं कि किसी भी क्षेत्र में आगे बढ़ने के लिए शिक्षित होना भी जरूरी है.



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